सोमवार, जून 14, 2010

कहीं 'वो' है तो नहीं !

उससे 
बहुत डरता हूँ मैं 
बचने के लिए मैंने 
खड़ी की हैं दीवारें भी 
लोग जिसे मेरा घर कहते हैं 

पर आखिर 
सोने का पिंज़रा भी जेल होता है
जैसे ही बाहर आऊं
मुड़ मुड़ के देखता हूँ
कहीं 'वो' है तो नहीं !

लोग पूछते हैं 
किससे डरते हो !
उससे ? जो है ही नहीं 
पर हाँ ,डर उसी का है 
जो 'नहीं' है |
 

2 टिप्‍पणियां:

  1. सुरेन्द्र जी लाजवाब रचना है...बधाई...
    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  2. मान गए शर्माजी....सभी का यही हल है...

    उत्तर देंहटाएं