बसंत छाया है चहुँ ओर
बसंत छाया है चहुँ ओर
धरती ने ओढ़ी है पीली चुनरिया—
खेतों में मुस्काती है सरसों
मानो हर डाली पर सूरज ठहरा हो।
कच्चे आम की खुशबू है हवाओं में
कोयल ने पहली तान छेड़ी है,
और पगडंडियों पर चलती धूप
रंगों की थाली लेकर खड़ी है।
होली के रंगों में सराबोर नर नारी —
गालों पर गुलाल, आँखों में शरारत,
ढोल की थाप पर थिरकते कदम
जैसे धड़कनों ने पहन लिए हों घुँघरू।
स्त्रियाँ भी आज सिमटी नहीं,
चूड़ियों में झनकता है उल्लास,
प्रिय के स्पर्श से दहक उठे
मन के सारे संकोच, सारी प्यास।
अंगना-अंगना हँसी की फुहार,
आँचल में सपनों की गंध,
रंगों से भीगा यह मधुर मिलन
बन गया है ऋतु का छंद।
आसमान ने भी बाँहें खोलीं,
धूप ने चूम लिया हर द्वार—
बसंत की यह मधुमयी बेला
रच रही है प्रेम का उत्सव अपार।
आज न कोई दूरी शेष रही,
न कोई विरह का शूल—
चारों दिशाएँ गा उठी हैं,
जब पीले हुए सरसो के फूल