रविवार, फ़रवरी 27, 2011

आओ उतरें जंगल में

बूढ़े पेड़ों की शाखों पर 
अब भी हलचल 
कुछ चिड़ियों के डेरे हैं 

सदियों तपे धूप में 
चीर फकीर के 
फटे तने हैं 
खोखल कहो भले ही 
जीवन-अमृत भरे कमंडल 
पिए गिलहरी,
अपनी जात पर पहरे हैं 

शब्द बहुत हैं,भाषा उन्नत 
लिखे हैं तुमने सोच सोच 
बारूद-आखर,
पर अपने अपने दडबे हैं 

काश!मिले कोई गंध तुम्हें 
हवा चलेगी,तरसोगे 
काश!मिले कुछ नज़र तुम्हें 
देख सको तुम अपनी किस्मत 
लपट आग की दहक रही 
और रक्त के घेरे हैं 
आओ उतरें जंगल में 
यहाँ तो घोर अँधेरे हैं

 

2 टिप्‍पणियां:

  1. पर अपने अपने दडबे हैं ...
    सुन्दर !

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  2. u write very authentic and geniun with deep heart.............the words u use only can arise from heartly......u give a new shine and shape to common words,,thanks
    my wishes always with u!!!!

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