रविवार, मई 23, 2010

सौंधी सी महक

बरसों से 
तपती रेत पर 
बरखा की पहली फुहार से उठी 
सौंधी सी महक ,तुझे पाकर
  बहुत डर गया हूँ मैं 


बालू के महल भरभराते 
ढहते टीलों के बियाबान समंदर में 
तुम टिकोगी कैसे !
छेद गई है अंतस 
तुम्हारी अल्पायु इयत्ता 


रोक तो नहीं पाऊंगा तुम्हें 
पर समझ गया हूँ  
उपजीव्य तुम्हारा ,
मेरा जलना और उबलना 


तपूंगा बरसों बरस फिर  
बन गंध मिलूंगा तुममें 
बरखा की पहली फुहार से उठी 
सौंधी सी महक

4 टिप्‍पणियां:

  1. यथार्थ की वस्तुगत समझ, उस पर एक व्यैक्तिक आभा से भरा रवैया और उसी से उपजी आशावादिता। कविता ठहरती है।

    शुक्रिया।

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  2. बालू के महल भरभराते
    ढहते टीलों के बियाबान समंदर में
    तुम टिकोगी कैसे !
    छेद गई है अंतस
    तुम्हारी अल्पायु इयत्ता

    bahut khoob

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  3. रोक तो नहीं पाऊंगा तुम्हें
    पर समझ गया हूँ
    उपजीव्य तुम्हारा ,
    मेरा जलना और उबलना

    tumhari alpaayu
    bahut gahri abhivayakti

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