सोमवार, फ़रवरी 16, 2026

बसंत

 बसंत छाया है चहुँ ओर 

बसंत छाया है चहुँ ओर 

धरती ने ओढ़ी है पीली चुनरिया—

खेतों में मुस्काती है सरसों 

मानो हर डाली पर सूरज ठहरा हो।


कच्चे आम की खुशबू है हवाओं में 

कोयल ने पहली तान छेड़ी है,

और पगडंडियों पर चलती धूप

रंगों की थाली लेकर खड़ी है।


होली के रंगों में सराबोर नर नारी —

गालों पर गुलाल, आँखों में शरारत,

ढोल की थाप पर थिरकते कदम

जैसे धड़कनों ने पहन लिए हों घुँघरू।


स्त्रियाँ भी आज सिमटी नहीं,

चूड़ियों में झनकता है उल्लास,

प्रिय के स्पर्श से दहक उठे

मन के सारे संकोच, सारी प्यास।


अंगना-अंगना हँसी की फुहार,

आँचल में सपनों की गंध,

रंगों से भीगा यह मधुर मिलन

बन गया है ऋतु का छंद।


आसमान ने भी बाँहें खोलीं,

धूप ने चूम लिया हर द्वार—

बसंत की यह मधुमयी बेला

रच रही है प्रेम का उत्सव अपार।


आज न कोई दूरी शेष रही,

न कोई विरह का शूल—

चारों दिशाएँ गा उठी हैं,

जब पीले हुए सरसो के फूल 

रविवार, फ़रवरी 15, 2026

जब तुम पास हो

 जब तुम पास होती हो,

तो समय ठहर जाता है,

और धड़कनें

तुम्हारी साँसों की लय में बहने लगती हैं।


तुम्हारा हाथ जब

मेरे हाथ में सिमटता है,

तो लगता है जैसे

सारी दूरियाँ हार मानकर

हमारे कदमों में बिखर गई हों।


तुम्हारा स्पर्श

मेरे अस्तित्व पर उतरी कोई कोमल धूप है,

जो मेरी रूह के हर कोने को

जीवन से भर देता है।


जब तुम मेरे कंधे पर

अपना सिर रखती हो,

तो लगता है जैसे

पूरा आकाश मेरे भीतर उतर आया हो,

और मैं स्वयं में पूरा हो गया हूँ।


तुम्हारी साँसों की गर्माहट

मेरी गर्दन को छूकर

एक अनकही कविता लिख जाती है,

जिसे सिर्फ मेरा दिल पढ़ सकता है।


उस पल,

न शब्दों की ज़रूरत होती है,

न वादों की—

बस तुम्हारा होना ही

मेरे होने का प्रमाण बन जाता है।


तुम्हारी उँगलियों का

धीरे से मेरे हाथों में उलझ जाना,

जैसे दो नदियाँ

अपने सारे नाम भूलकर

एक ही समंदर बन गई हों।


तुम्हारे पास होने पर,

मेरी हर अधूरी साँस पूरी हो जाती है,

और मैं समझ जाता हूँ—

प्रेम सिर्फ देखा नहीं जाता,

उसे छूकर महसूस किया जाता है।


शुक्रवार, फ़रवरी 13, 2026

तुम जो हो

 तुम हो तो

मेरी खामोशियों को भी आवाज़ मिलती है,

वरना ये दिल

भीड़ में भी अकेला सा धड़कता है।


तुम्हारी आँखों में

मैंने अपना पूरा आकाश देखा है,

जहाँ हर तारा

मेरे नाम की रौशनी से चमकता है।


तुम्हारा हाथ थाम लेना

मेरे लिए किसी प्रार्थना सा है,

जिसमें शब्द नहीं होते,

पर सुकून पूरा होता है।


मंगलवार, जनवरी 27, 2026

बस जिस्म लिए घूमते हैँ

 बेजान सा जिस्म लिए घूमते हैं,

तू नहीं—तो मैं भी पूरा कहाँ हूँ।

साँसें तो हैं, पर हर साँस में

तेरे न होने का ज़हर घुला हुआ है।


जिस जगह तूने आख़िरी बार देखा था,

वहीं से वक़्त ठहर गया है।

दिन आगे बढ़ते जाते हैं,

और मैं हर रोज़ उसी मोड़ पर रह गया हूँ।


रातें अब नींद नहीं देतीं,

बस तेरी परछाईं ओढ़ा करती हैं।

तकिये से पूछता हूँ तेरा पता,

और आँखे चुपचाप भीग जाया करती हैं।


लोग कहते हैं—सब बीत जाएगा,

उन्हें क्या पता, कुछ नहीं बीतता।

विरह वो आग है जो जलती नहीं,

बस भीतर-ही-भीतर सब राख करती है।


बेजान सा जिस्म लिए घूमते हैं,

क्योंकि तू कहीं ज़िंदा है मुझमें।

और अजीब बात ये है—

तेरे बिना भी, मैं सिर्फ़ तुझसे ही भरा हूँ।


गुरुवार, जनवरी 22, 2026

पानी पर चांद

 तुम मेरे पानी में देखे हुए चाँद हो,

स्थिर नहीं, बस क्षण भर का उजास,

हवा का हल्का-सा झोंका और 

लहरों में बिखर जाता है तुम्हारा अक्स।


मैं हाथ बढ़ाता हूं 

पर पकड़ में आता है

सिर्फ़ काँपता हुआ प्रतिबिंब,

सच नहीं,

बस सच जैसा एक धोखा।


तुम मृग-मरीचिका जैसी हो,

रेत के सीने पर उगता हुआ विश्वास,

जिसके पीछे मैं

अपनी सारी प्यास लिए दौड़ता रहा 

और हर बार

और ज़्यादा सूखता गया।


तुम्हारी उपस्थिति

मेरे पास होने से ज़्यादा

मेरे अभाव में जीती है,

जैसे कोई सपना

जो जागने से पहले ही

खुद को तोड़ देता है।


कभी लगता है

कि अगर पानी थम जाए,

हवा सो जाए,

तो तुम ठहर जाओगी 

पर शायद

तुम्हारा होना ही

अस्थिरता का दूसरा नाम है।


तुम चाँद हो,

पर आकाश में नही

और मैं

बस एक बेचैन पानी,

जिसे हर लहर के बाद

तुम्हें खोने की आदत हो गई है।


सोमवार, जनवरी 19, 2026

पर तू नहीं

 यादों के पेड़ पर

खिलने लगे हैं

वासंती फूल,

पर तू नहीं है।


धूप उतर आई है

आँगन की देहरी तक,

छाँव भी ठहरती है

थोड़ा-सा रुककर,

सब कुछ है

अपनी जगह पर 

पर तू नहीं है।


पत्तों की सरसराहट में

अब भी सुनाई देता है

तेरा नाम,

नदी की लहरें आज भी

वैसे ही गुनगुनाती हैं,

जैसे कभी

तेरे साथ बहा करती थीं,

पर तू नहीं है।


रातें लंबी हो गई 

तारे गिनते-गिनते

थक जाती हैँ उंगलियां 

नींद पूछती है

कहाँ खो गया वह सपना

जिसमें तू थी,

पर तू नहीं है।


मैं हर सुबह

खुद से कहता हूँ

सब ठीक है,

और हर शाम

यह झूठ

थोड़ा-सा टूट जाता है,

क्योंकि

यादें तो हैं,

मौसम भी है,

ज़िंदगी भी है,

पर

तू नहीं है।

रविवार, फ़रवरी 27, 2011

आओ उतरें जंगल में

बूढ़े पेड़ों की शाखों पर 
अब भी हलचल 
कुछ चिड़ियों के डेरे हैं 

सदियों तपे धूप में 
चीर फकीर के 
फटे तने हैं 
खोखल कहो भले ही 
जीवन-अमृत भरे कमंडल 
पिए गिलहरी,
अपनी जात पर पहरे हैं 

शब्द बहुत हैं,भाषा उन्नत 
लिखे हैं तुमने सोच सोच 
बारूद-आखर,
पर अपने अपने दडबे हैं 

काश!मिले कोई गंध तुम्हें 
हवा चलेगी,तरसोगे 
काश!मिले कुछ नज़र तुम्हें 
देख सको तुम अपनी किस्मत 
लपट आग की दहक रही 
और रक्त के घेरे हैं 
आओ उतरें जंगल में 
यहाँ तो घोर अँधेरे हैं