बेजान सा जिस्म लिए घूमते हैं,
तू नहीं—तो मैं भी पूरा कहाँ हूँ।
साँसें तो हैं, पर हर साँस में
तेरे न होने का ज़हर घुला हुआ है।
जिस जगह तूने आख़िरी बार देखा था,
वहीं से वक़्त ठहर गया है।
दिन आगे बढ़ते जाते हैं,
और मैं हर रोज़ उसी मोड़ पर रह गया हूँ।
रातें अब नींद नहीं देतीं,
बस तेरी परछाईं ओढ़ा करती हैं।
तकिये से पूछता हूँ तेरा पता,
और आँखे चुपचाप भीग जाया करती हैं।
लोग कहते हैं—सब बीत जाएगा,
उन्हें क्या पता, कुछ नहीं बीतता।
विरह वो आग है जो जलती नहीं,
बस भीतर-ही-भीतर सब राख करती है।
बेजान सा जिस्म लिए घूमते हैं,
क्योंकि तू कहीं ज़िंदा है मुझमें।
और अजीब बात ये है—
तेरे बिना भी, मैं सिर्फ़ तुझसे ही भरा हूँ।