तुम मेरे पानी में देखे हुए चाँद हो,
स्थिर नहीं, बस क्षण भर का उजास,
हवा का हल्का-सा झोंका और
लहरों में बिखर जाता है तुम्हारा अक्स।
मैं हाथ बढ़ाता हूं
पर पकड़ में आता है
सिर्फ़ काँपता हुआ प्रतिबिंब,
सच नहीं,
बस सच जैसा एक धोखा।
तुम मृग-मरीचिका जैसी हो,
रेत के सीने पर उगता हुआ विश्वास,
जिसके पीछे मैं
अपनी सारी प्यास लिए दौड़ता रहा
और हर बार
और ज़्यादा सूखता गया।
तुम्हारी उपस्थिति
मेरे पास होने से ज़्यादा
मेरे अभाव में जीती है,
जैसे कोई सपना
जो जागने से पहले ही
खुद को तोड़ देता है।
कभी लगता है
कि अगर पानी थम जाए,
हवा सो जाए,
तो तुम ठहर जाओगी
पर शायद
तुम्हारा होना ही
अस्थिरता का दूसरा नाम है।
तुम चाँद हो,
पर आकाश में नही
और मैं
बस एक बेचैन पानी,
जिसे हर लहर के बाद
तुम्हें खोने की आदत हो गई है।