यादों के पेड़ पर
खिलने लगे हैं
वासंती फूल,
पर तू नहीं है।
धूप उतर आई है
आँगन की देहरी तक,
छाँव भी ठहरती है
थोड़ा-सा रुककर,
सब कुछ है
अपनी जगह पर
पर तू नहीं है।
पत्तों की सरसराहट में
अब भी सुनाई देता है
तेरा नाम,
नदी की लहरें आज भी
वैसे ही गुनगुनाती हैं,
जैसे कभी
तेरे साथ बहा करती थीं,
पर तू नहीं है।
रातें लंबी हो गई
तारे गिनते-गिनते
थक जाती हैँ उंगलियां
नींद पूछती है
कहाँ खो गया वह सपना
जिसमें तू थी,
पर तू नहीं है।
मैं हर सुबह
खुद से कहता हूँ
सब ठीक है,
और हर शाम
यह झूठ
थोड़ा-सा टूट जाता है,
क्योंकि
यादें तो हैं,
मौसम भी है,
ज़िंदगी भी है,
पर
तू नहीं है।