मंगलवार, जनवरी 27, 2026

बस जिस्म लिए घूमते हैँ

 बेजान सा जिस्म लिए घूमते हैं,

तू नहीं—तो मैं भी पूरा कहाँ हूँ।

साँसें तो हैं, पर हर साँस में

तेरे न होने का ज़हर घुला हुआ है।


जिस जगह तूने आख़िरी बार देखा था,

वहीं से वक़्त ठहर गया है।

दिन आगे बढ़ते जाते हैं,

और मैं हर रोज़ उसी मोड़ पर रह गया हूँ।


रातें अब नींद नहीं देतीं,

बस तेरी परछाईं ओढ़ा करती हैं।

तकिये से पूछता हूँ तेरा पता,

और आँखे चुपचाप भीग जाया करती हैं।


लोग कहते हैं—सब बीत जाएगा,

उन्हें क्या पता, कुछ नहीं बीतता।

विरह वो आग है जो जलती नहीं,

बस भीतर-ही-भीतर सब राख करती है।


बेजान सा जिस्म लिए घूमते हैं,

क्योंकि तू कहीं ज़िंदा है मुझमें।

और अजीब बात ये है—

तेरे बिना भी, मैं सिर्फ़ तुझसे ही भरा हूँ।


गुरुवार, जनवरी 22, 2026

पानी पर चांद

 तुम मेरे पानी में देखे हुए चाँद हो,

स्थिर नहीं, बस क्षण भर का उजास,

हवा का हल्का-सा झोंका और 

लहरों में बिखर जाता है तुम्हारा अक्स।


मैं हाथ बढ़ाता हूं 

पर पकड़ में आता है

सिर्फ़ काँपता हुआ प्रतिबिंब,

सच नहीं,

बस सच जैसा एक धोखा।


तुम मृग-मरीचिका जैसी हो,

रेत के सीने पर उगता हुआ विश्वास,

जिसके पीछे मैं

अपनी सारी प्यास लिए दौड़ता रहा 

और हर बार

और ज़्यादा सूखता गया।


तुम्हारी उपस्थिति

मेरे पास होने से ज़्यादा

मेरे अभाव में जीती है,

जैसे कोई सपना

जो जागने से पहले ही

खुद को तोड़ देता है।


कभी लगता है

कि अगर पानी थम जाए,

हवा सो जाए,

तो तुम ठहर जाओगी 

पर शायद

तुम्हारा होना ही

अस्थिरता का दूसरा नाम है।


तुम चाँद हो,

पर आकाश में नही

और मैं

बस एक बेचैन पानी,

जिसे हर लहर के बाद

तुम्हें खोने की आदत हो गई है।


सोमवार, जनवरी 19, 2026

पर तू नहीं

 यादों के पेड़ पर

खिलने लगे हैं

वासंती फूल,

पर तू नहीं है।


धूप उतर आई है

आँगन की देहरी तक,

छाँव भी ठहरती है

थोड़ा-सा रुककर,

सब कुछ है

अपनी जगह पर 

पर तू नहीं है।


पत्तों की सरसराहट में

अब भी सुनाई देता है

तेरा नाम,

नदी की लहरें आज भी

वैसे ही गुनगुनाती हैं,

जैसे कभी

तेरे साथ बहा करती थीं,

पर तू नहीं है।


रातें लंबी हो गई 

तारे गिनते-गिनते

थक जाती हैँ उंगलियां 

नींद पूछती है

कहाँ खो गया वह सपना

जिसमें तू थी,

पर तू नहीं है।


मैं हर सुबह

खुद से कहता हूँ

सब ठीक है,

और हर शाम

यह झूठ

थोड़ा-सा टूट जाता है,

क्योंकि

यादें तो हैं,

मौसम भी है,

ज़िंदगी भी है,

पर

तू नहीं है।